ये बात सरासर गलत की बाबा साहब जी को मुसलमानों और इसाई दोनों ने अपने धर्म में लेने की कोशिस की, हां ये बात जरूर कही जा सकती है की बाबा साहब जी खुद एक नये धर्म की तलाश में थे क्योकि उस वक़्त तक समस्त दलित समाज धार्मिक मामलो में ब्राह्मण-आर्यों का ही अनुसरण करता था
लेकिन ब्राह्मण-आर्य इन्हें तुच्छ,नीच, और अछूत कह कर इनका त्रस्कार करते थे,
शायद बाबा साहब जी को भी अब लगने लगा था की इन खुदगर्ज़ ब्राह्मण-आर्यों का अनुसरण करते रहने से कभी भी दलितों का उत्थान नहीं हो सकता बस यही कारण था जिसकी वजह से बाबा साहब जी एक नये धर्म की तलाश में लग गए,
बाबा साहब जी के समक्ष अनेक धर्म और अनेक विकल्प थे, जिनमे इस्लाम और इसाई धर्म प्रमुख थे,
और सचमुच बाबा साहब जी इन्ही धर्मो में से एक धर्म को अपनाने वाले थे, लेकिन बाबा साहब जी की एक अच्छी आदत ये भी थी कि वे सदा ही अपने सहयोगियों के परामर्श से ही समस्त कार्य संपादित करते थे,
और इस मामले पर भी बाबा साहब जी ने अपने सहयोगियों जो की ब्राह्मण-आर्य थे उनसे परामर्श किया, और फिर किया था बाबा साहब जी के सहयोगियों ## + ## + ## जोकि ब्राह्मण-आर्य थे उन्होंने अपनी राजनैतिक चाल चली,
और इस मामले पर भी बाबा साहब जी ने अपने सहयोगियों जो की ब्राह्मण-आर्य थे उनसे परामर्श किया, और फिर किया था बाबा साहब जी के सहयोगियों ## + ## + ## जोकि ब्राह्मण-आर्य थे उन्होंने अपनी राजनैतिक चाल चली,
और वो चाल कुछ इस तरह थी कि वे दलितों को सनातन या आर्य धर्म में लाकर उन्हें अपने समकक्ष सम्मान तो नहीं देना चाहते थे लेकिन इसाई या मुसलमान बनाकर अपना विरोधी भी नहीं बनाना चाहते थे,
अब जरूरत थी एक ऐसे धर्म की जिसको अपनाने की सलाह देकर ये धर्मांध पाखंडी लोग अपने धर्म को भी दलितों से अलग रख सके और मुसलमानों पर जुल्मो-सितम करने के लिए दलितों को अपने साथ भी रख सके इस लिए इन्होने बाबा साहब जी को बौद्ध धर्म अपनाने की सलाह दी,
अब जरूरत थी एक ऐसे धर्म की जिसको अपनाने की सलाह देकर ये धर्मांध पाखंडी लोग अपने धर्म को भी दलितों से अलग रख सके और मुसलमानों पर जुल्मो-सितम करने के लिए दलितों को अपने साथ भी रख सके इस लिए इन्होने बाबा साहब जी को बौद्ध धर्म अपनाने की सलाह दी,
और इस तरह चालाक पाखंडीयो ने अपने धर्म को भी अपवित्र होने से बचा लिया और मुसलमानों और इसाइयों को भी मजबूत नहीं होने दिया,
इनकी चाल सफल हो गई अपने धर्म परिवर्तन के बाद भी या यु कहे कि बौध धर्म को अपनाने के बाद आज भी इस देश के दलित , दलित ही कहलाते है,
इसके विपरीत अगर दलित इसाई या मुसलमान बन जाते तो वे इसाई या मुसलमान कहलाते, लेकिन दलितों के इसाई या मुसलमान बन्ने से इसाई या मुसलमानों कि ताकत बढ़ सकती थी और इन्हें भविष्य में राजनैतिक हानि उठानी पड़ सकती थी इस लिए इन्होने ये चाल चली,
और फिर बस एक उधार के लफ्ज़ हिन्दू का फरेब देकर सबको मुसलमानों के खिलाफ एकता के सूत्र में बाँधने लगे, ये चाल बड़ी ही सफाई से चली गयी ठीक उसी तरह जिसतरह फ़िरोज़ खान को फिरोज गाँधी में परिवर्तित करने के लिए चाल चली गयी थी और ये चाल भी उन्ही तमाम चालो में से एक है जिन चालो ने तमाम हिन्दुस्तान को आजतक भ्रमित कर रख्खा है
लेकिन षड़यंत्र चाहे कितना भी विशाल हो भ्रम चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो ये एक दिन जरूर टूट जायेगा हकीकत की सुबह अब जल्द आयेगी
इन सभी चालो और भ्रमो को तोडना ही मेरा द्रढ़ संकल्प है,
"नसीम निगार हिंद"

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