आज हामारे देश में हिन्दू धरम और हिंदुत्व के नाम पर कई संगठन और राजनैतिक दल अपनी सियासी रोटी सेकते और अपनी राजनैतिक दुकाने चलाते है, हिन्दू धरम के नाम पर लोगो को लड़ाना, हिंदुत्व के नाम पर दंगे कराना इनके मुख्य हथियार है,
इतिहास गवाह है कि 18 वी सदी तक समस्त संसार में हिन्दू नाम का कोई धरम मौजूद नहीं था लेकिन 1857 में मुसलमानों कि हुकुमत ख़तम होने तक अंग्रेजो की नयी हुकुमत के साथ-साथ तीन-चार हजार साल से भी अधिक पुराने सनातन-आर्य धरम का एक नया नाम हिन्दू धरम भी सामने आता है,
(( ये एक अकाल सत्य है क्योकि सनातन-आर्य धरम के समस्त धार्मिक ग्रंथो में हिन्दू धरम नाम का कोई शब्द आजतक लिखा हुवा नहीं पाया गया, और ये शब्द सनातन-आर्य धरम के धार्मिक ग्रंथो में मिल भी केसे सकता है क्योकि ये फ़ारसी भाषा का लफ्ज़ है जिसका अपमान जनक अर्थ है- चोर, गुलाम या लुटेरा ))
अब एक सवाल ये भी उठता है की अगर संस्कृत समस्त भाषाओ की जननी है तो सनातन-आर्य धरम को एक नया नाम देने के अवसर पर एक धनि भाषा संस्कृत एक निर्धन भासा में क्यों परिवर्तित हो जाती है और सदियों से देवताओं की भासा कही जाने वाली संस्कृत भासा यकायक मुगलों की भाषा यानि फ़ारसी पर क्यों आश्रित होजाती है?
इस सवाल का जवाब घिनोनी मानसिकता वाले उन सभी लोगो की पोल खोलता है जिन्होंने सनातन-आर्य धरम को हिन्दू धरम नाम देने के समय एक बार भी नहीं सोचा होगा की इसमें सनातन-आर्य धरम का अपमान है या सम्मान, चलो सनातन-आर्य धरम से अलग मै संस्कृत भाषा की बात करता हु, यहाँ संस्कृत भाषा प्रेमियों और सनातन-आर्य धरम प्रेमियों से मेरा एक सवाल है कि,,,
सनातन-आर्य धरम को एक नया नाम देने के अवसर पर समस्त भाषाओं कि जननी और देवताओं कि भाषा कही जाने वाली संस्कृत भाषा के समस्त शब्दों का त्रस्कार कर के मुगलों कि भाषा फ़ारसी से हिन्दू शब्द का लिया जाना क्या संस्कृत भाषा का अपमान नहीं????
यकीनन ये संस्कृत भाषा का अपमान है,,,
इसी लिए सनातन-आर्य धरम के सच्चे सेवक सनातन-आर्य धरम को आज भी सनातन-आर्य धरम ही कहते है, लेकिन हिन्दू धरम और हिंदुत्व के ठेकेदार बनने वाले सिर्फ ये लोग जिनका धरम से कोई लेना-देना नहीं है और ये हमेशा से सिर्फ और सिर्फ सत्ता के पुजारी रहे है,
और कुछ ऐसे लोग है जिनमे अपनी बुद्धि जैसी कोई चीज नहीं है, ये लोग सिर्फ वाही देखते है जो इन्हें शातिर सनातन-आर्यों ने दिखाया है, और ये लोग वाही बोलते है जो शातिर सनातन-आर्यों ने इन्हें बताया है, ये अज्ञानी लोग उन्ही शातिर लोगो की पैरवी करते हुवे कहते है कि हिन्दू धरम 18 वी सदी से पहले भी मौजूद था, मुगलों और सल्तनत काल से पहले भी मौजूद था, फ़ारसी ज़बान के हिन्दुस्तान में आने से पहले भी मौजूद था, इस्लाम के यहाँ आने से पहले भी मौजूद था, इसाई धरम के उदय से पहले भी मौजूद था, बौद्ध धरम के उदय से पहले भी मौजूद था, इन सभी लोगो की जानकारी के लिए मै बताना चाहुगा की धरम तो बहुत पहले से मौजूद था लेकिन उस समय उस धरम को सनातन-आर्य धरम या वैदिक धरम ही कहा जाता था नाकि हिन्दू धरम,
ये एक अकाल सत्य है कि इस देस में हिदू शब्द फ़ारसी की ही देन है और एक अकाल सत्य के लिए सबूत माँगना या सबूत पेश करना मूर्खता से जियादा और क्या होगा, और जो इस अकाल सत्य को झुटलाना चाहते है मै उन लोगो से जरूर कहुगा कि कोई एक सबूत तो ऐसा पेश करे जिससे ये साबित होजाये कि हिन्दू शब्द फ़ारसी भाषा का नहीं, संस्कृत भाषा का है, और फ़ारसी भाषा के इस देश में आने से पहले भी इस देश में इस्तेमाल किया जाता था, बेशक ऐसा कोई तथ्य मौजूद ही नहीं है,
बस ये तो सत्ता कि लालसा में शातिर लोगो द्वारा बनाया गया सियासत का जाल है, जिसे सनातन-आर्य धरम कि जगह पर भोले-भाले लोगो को फ़साने के लिए शातिर सनातन-आर्यों द्वारा निर्मित किया गया,
इन्ही लोगो ने सत्ता की लालसा में लोकतंत्र के आगाज़ पर इन्ही के हाथो हमेशा से सताए गए लोगो को अपने धार्मिक-समाज का हिस्सा बताकर उनका समर्थन पाने के बाद बहुसंख्यक बनकर सत्ता पाने के लिए भोले-भाले लोगो को फ़साने के लिए हिन्दू धरम और हिंदुत्व नामक कई जाल बुने, क्योकि लोकतंत्र में सत्ता बल के आधार पर नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ जनसंख्या के आधार पर पाई जा सकती है, इसलिय अब इन्होने शूद्रो, सिख्खो और अन्य जातियों को अपने राजनैतिक जाल यानि हिन्दू धरम और हिंदुत्व में फ़साने की योजना बनाई जो कारगर साबित हुई,,,,
अब यहाँ पर एक तथ्य ये उभरता है कि
क्या सचमुच हिन्दू धरम लोगो को फरेब देकर लाभ उठाने की व्यवस्था का नाम है???
आइये गौर करे,,,,
इतिहास गवाह है की संसार में जबसे सभ्यता कायम हुई तब से लेकर आज तक इस दुनिया में हिन्दू नाम का कोई भी धरम पैदा नहीं हुवा, और हमारे वतन हिन्दोस्तान में भी हिन्दू धरम नाम का इस्तेमाल शातिर सनातन-आर्यों द्वारा अंग्रेजी शाशन के दौरान सनातन-आर्य धरम की खोखली और घिनोनी व्यवस्था को छुपाकर, अछूत और नीछ कहकर प्रताड़ित की गयी जातियों पर अपना धरम या अपनी व्यवस्था को थोपने के लिए किया गया, क्योकि घिनोनी मानसिकता वाले ये तुच्छ लोग शुद्रो को सनातन-आर्य बताकर पंडित या ब्रह्मण नहीं बनाना चाहते थे इसलिए इन्होने हिन्दू धरम नाम का एक जाल बुना जिसमे शुद्रो समेत उन सभी जातियों को फसाया जो सनातन-आर्य धरम द्वारा हमेशा से सताई गई,,,,
और सनातन-आर्यों के ये सब करने का एक मात्र कारण लोकतन्त्र ही था क्योकि,,,
हिन्दुस्तान में राजशाही ख़तम होने के बाद अंग्रेजी शाशन के दौरान ही भविष्य में लोकतंत्र की संभावनाए दिखने लगी थी, और लोकतंत्र में सत्ता जनसंख्या पर आधारित होती है,
क्योकि सनातन-आर्य अल्पसंखयक थे इसलिए सनातन-आर्यों को सत्ता हासिल करने के लिए शुद्रो की घोर आवस्यकता दिखाई देने लगी, अब सनातन-आर्यों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी की उन शूद्रो को अपनी गोद में केसे खिलाये जिन्हें उन्होंने हमेशा अछूत कह कर प्रताड़ित किया है तब ये शातिर सनातन-आर्य इन भोले-भाले शूद्रो को हिन्दू नाम का झूला झुलाते है और केवल शूद्रो को ही नहीं बल्कि इन सनातन-आर्यों ने मुसलमान और इसाई धरम के लोगो को छोड़ कर अन्य तमाम धरम और जाती के लोगे को हिन्दू शब्द के जाल में फसाया और उन्हें मूर्ख बनाकर कर सत्ता हासिल की,
हिन्दू नाम का कोई धरम हिन्दुस्तान में तो किया बल्कि पूरी दुनिया में ना तो कभी था नाही आज है हिन्दू धरम हकीकत में फरेब का एक राजनैतिक जाल है,
ये साबित करने के लिए मै एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूगा, उदाहरण है सनातन-आर्यों और शूद्रो का जैसा के सभी जानते है की सनातन-आर्य मध्य एशिया से हमारे इस वतन हिन्दोस्तान में आये, इन्होने ही सिन्धु घाटी जैसी सुद्रढ़ सभ्यता को तहस-नहस किया और उस तमाम इलाके पर अपना कब्ज़ा कर लिया, इसके बाद इस देस के मूल निवासियों को शूद्र की उपाधि देकर अछूत बताकर सदा के लिए त्रास्कार का भागी बना दिया, दुसरे शब्दों में हम ये कह सकते है कि सनातन-आर्यों ने सदा से ही शुद्रो को अपमानित किया, उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया, उन्हें प्रताड़ित किया और उन्हें जानवरों से भी बदतर ज़िन्दगी जीने पर मजबूर कर दिया, और यही सिलसिला सदियों तक चलता रहा,
या य़ू कहे कि ये सिलसिला 2500 या 3000 से भी अधिक सालो तक बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के आने तक चलता रहा और शायद ये सिलसिला आगे भी कभी ना बन्द होता अगर इस देश में लोकतंत्र कायम ना होता, क्योकि बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के उदय के बाद तमाम शुद्र बाबा साहेब के समर्थक और आज्ञाकारी बन गये, बाबा साहेब ये अच्छी तरह जान चुके थे कि शुद्र जब तक शुद्र बने रहेगे उनका उत्थान नहीं हो सकता, शुद्रो से शुद्र और अछूत नाम का कलंक हटाने के लिए बाबा साहेब ने एक नए धरम की खोज शुरू करदी इधर सनातन-आर्यों की धरकने बढ़ गयी, इन्होने अपने बर्ताव बदलाव लाना शुरू किया, इन पाखंडियो की अपने बर्ताव में बदलाव लाने की एक मात्र मजबूरी लोकतंत्र ही थी, राजशाही की लालसा और लोकतंत्र ने ही इन्हें मजबूर करदिया जिसके चलते ये शुद्रो से हमदर्दी जताने लगे, और उन्हें गले लगाने लगे,,,
क्योकि लोकतंत्र में अपना राज कायम करने के लिए और मुसलमानों का सफाया करने के लिए सनातन-आर्यों को शुद्रो की घोर आवश्यकता थी,
क्योकि लोकतंत्र में बादशाही ताकत पे नहीं जनसँख्या पर आधारित होती है, इसलिए बाबा साहेब को उन्ही की विचार-धारा वाले धरम की और मोड़ा गया ताकि सनातन-आर्य अपनी विचार-धारा के लोगो के साथ बहुसंख्यक हो जाए और उन्हें ही हमेशा सत्ता प्राप्त हो,,,,,,,,
और हिन्दू धरम भी इसी राजनीति का एक हिस्सा मात्र था जिसका मुख्या उद्देश्य हिन्दुस्तान में रहने वाली सभी गैर-मुस्लिम और गैर-इसाई जातियों को मूर्ख बनाकर राजनैतिक लाभ उठाना था, और सनातन-आर्यों को इसमें पूर्ण सफलता भी मिल गयी,
इसका सबूत भी मै आपको दिखाना चाहुगा,,,
आप सभी को याद होगा बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ने अपनी धरम परिवर्तन की इच्छा का ऐलान करते वक़्त कहा कि,,,
मै हिन्दू बनकर पैदा ज़रूर हुवा हु लेकिन हिन्दू रहकर मरू गा नहीं!!!
अब यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि अगर हिन्दू धरम सच में सनातन-आर्य धरम ही है तो बाबा साहेब ने ये क्यों नहीं कहा कि,,,
मै सनातन-आर्य बनकर पैदा ज़रूर हुवा हु लेकिन सनातन-आर्य रहकर मरू गा नहीं!!!
बस इस षड़यंत्र को समझने के लिए बाबा साहेब के ये बोल ही काफी है,
आइये गौर करे कि उस वक़्त बाबा साहेब और तमाम शुद्र किस धरम के अनुयायी थे,,,
सनातन-आर्य धरम के :- धरम इंसानी आस्था से जुड़े उन नियमो और कानूनों को कहा जाता है जिन्हें इंसान अपनी इच्छा से अपनाता है और जो इंसान को जीने की राह बता कर उसके जीवन को खुशहाल बनाने में मदद करते है,
अब पहली गौर करने वाली बात ये है की
क्या सनातन-आर्य धरम के नियमो का पालन कर अछूत कहलाने में शुद्रो की इच्छा शामिल थी???
हरगिज़ नहीं बल्कि शुद्रो पर सनातन-आर्य धरम के ये नियम कानून जबरदस्ती थोपे गये, उन्हें अपने सामने नीछ और अछूत बनाए रखने के लिए,
दूसरी बात गौर करने वाली बात ये है कि
क्या सनातन-आर्य धरम ने शुद्रो को जीने की राह बता कर उनके जीवन को खुशहाल बनाने में मदद की है???
जवाब फिर वही ,,,,, हरगिज़ नहीं!!!! सनातन-आर्य धरम ने सदा ही शुद्रो को सिर्फ और सिर्फ दुःख, त्रास्कार और प्रताड़ना ही दी है, जीने के अधिकार छीन कर उन्हें जीते जी नरक में ही धकेला है,
इस स्थिति के बाद भी अगर हम ये कहे की शुद्र सनातन-आर्य धरम को अपना धरम कहते थे तो ये अतिश्योक्ति होगी, मै समझता हु की ये कहना भी बाबा साहेब और तमाम शुद्रो का अपमान होगा की ये सनातन-आर्य धर्मी थे,,,
जैन धरम के :- शुद्र जैन धर्मी नहीं थे, जैसा की इतिहास में लिखा है,
बौद्ध धरम के :- इतिहास गवाह है की जब बाबा साहेब ने ये शब्द कहे उस समय तक बाबा साहेब और तमाम शुद्र बौद्ध धर्मी भी नहीं थे, बाबा साहेब ने नए धरम के तौर पर बौद्ध धरम को अपनाया,
सिख धरम :- बाबा साहेब और तमाम शुद्र सिख भी नहीं थे,
पारसी धरम :- बाबा साहेब और तमाम शुद्र पारसी भी नहीं थे,
इसाई धरम :- बाबा साहेब और तमाम शुद्र इसाई भी नहीं थे, लेकिन बाबा साहेब के सामने नया धरम अपनाने के लिए ये धरम विकल्प के रूप में अवस्य था,
इस्लाम धरम :- बाबा साहेब और तमाम शुद्र इस्लाम के भी मानने वाले नहीं थे, लेकिन बाबा साहेब के सामने नया धरम अपनाने के लिए ये धरम विकल्प के रूप में अवस्य था,,,
हकीकत तो ये है कि उस वक़्त बाबा साहेब के पास कोई भी धरम नहीं था,
और ये जो था ही नहीं इस का नाम हिन्दू धरम था और आज भी यही स्थिति है
इस तरह साबित होता है कि हिन्दू धरम सनातन-आर्यों कि सिर्फ एक राजनैतिक चाल थी जो शुद्रो और अन्य जातियों को अपने जाल में फ़साने के बाद बहुसंख्यक बनकर लोकतंत्र में सत्ता पाने के लिए चली गयी थी,
बस इतनी सी कहानी है हिन्दू धरम कि
समझदार को इशारा काफी,,,,,,,,,
और मुर्ख के लिए लम्बी बहस भी कम,,,,,,,
Naseem Nigar Hind


